रत्नरंजिनी श्रील प्रभुपाद के वचन का प्रमाण थी- ” 16 माला जप करो, नियामक सिद्धांतो का पालन करो और तुम वापिस भगवान के पास आ जाओगे।”
बिना किसी अत्यधिक प्रयास के, अपनी सेवा परिणामस्वरूप, वह जीवन के लक्ष्य को पाने में अनायास ही सफल हो गयी।
मैं चकित था और अब भी हूँ। उनके शरीर त्यागने के कुछ दिन बाद तक भी मैंने उनके बारे में नहीं सोचा। मैं उनसे और प्रश्न कर सकता था लेकिन मुझे संदेह है कि उन्होंने मुझे और कुछ बताया होता। वह वैसी ही थी। मैंने बलभद्र प्रभू (अब बी. बी. पूरी महाराज) से रत्ना के अंतिम दिनों के बारे में लिखने के लिए कहा।
मुझे पता था यह (भक्तों) पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए समान रूप से प्रेरणा का एक बड़ा स्त्रोत होगा। हमें सिर्फ रत्ना की तरह विश्वास रखने की आवश्यकता है।
(प. पू. शिवराम स्वामी महाराज की प्रस्तावना से)


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